सुनहरे पल

जीवन का हर पल बहुत सुंदर होता है चाहे वह खट्टा हो ,मीठा हो या कड़वा हो । हमें किसी न किसी एहसास से अवगत करा जाता है । सुनहरे पल शीर्षक के अंतर्गत हम उन पलों का वर्णन करेंगे जो हमने अपने बचपन में बिताए है क्योंकि आज के कड़वाहट भरे जीवन में वह पल एक सुकून सा दे जाते हैं । इन पलों को व्यक्त करने का एक और कारण है यह बताना कि उस समय की सोच कितनी अच्छी थी।

हम जहां रहते थे पड़ोसी भी परिवार के सदस्य की तरह ही लगते थे । हम शायद चौथी कक्षा में होंगे तब मैंने , मेरी दोस्त ने जो पड़ोस में ही रहती थी और जीजी ने सोचा कि हम अपने गुड्डे गुड़िया की शादी करते हैं । यह बात हमने घर में बताई पर हमने सोचा ना था ऐसा कमाल हुआ । हमारे बाबा दादी , ताऊजी ताई जी , मम्मी पापा सब तैयार हो गए और हम लोग गुड़िया वाले बने पर मैं गुड्डे वालों की तरफ से थी जो पड़ोस में ही रहते थे । मैं अपने ही घर में बाराती बनकर आई। हमारा स्वागत हुआ । आंगन में सब बच्चों के लिए आसन बिछाया गया । बड़े प्यार से बैठा कर हमें घर के बड़ों ने मिलकर भोजन कराया यह पल हम कभी नहीं भूल पाए

जरा सा गुड्डे गुड़ियों की शादी का ही तो विचार था परंतु घर के बड़ों ने सहयोग कर हम बच्चों को अपार खुशी दे दी। यह पल हमें सिखाता है कि घर में छोटों की भावनाओं का भी सम्मान होना चाहिए तभी परिवार परिवार होता है।


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